राजनीतिक गतिविधियों में विशेष पिछड़ी बैगा जनजाति की सहभागिता
बृजभूषण वर्मा1, रीना मजूमदार2, प्रमोद यादव3
1शोधार्थी-राजनीति विज्ञान सेठ रतनचंद सुराना कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, दुर्ग, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
2शोध निर्देशक, सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान) डॉ. खूबचंद बघेल शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई-3, जिला-दुर्ग (छ.ग.)
3सह-शोध निर्देशक सहायक प्राध्यापक (राजनीति विज्ञान) सेठ रतनचंद सुराना कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
प्रस्तुत षोध पत्र छत्तीसगढ़ राज्य की विषेष पिछड़ी जनजातियों में पंचायती राज अधिनियम के तहत राजनीतिक आरक्षण एवं राजनीतक गतिविधियों में विभिन्न प्रकार की सहभागिता ज्ञात करने का प्रयास किया गया है। षोध कार्य को पूर्ण करने का मुख्य उद्देष्य राजनीतिक गतिविधियों में बैगा की जनजाति भूमिका का अध्ययन इनकी राजनीतिक नेतृत्व की चुनौतियों को ज्ञात करना व सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व एवं निर्णयन है। प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित इस षोध पत्र में उत्तरदाताओं से साक्षात्कार समंकों का संकलन किया गया है, साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग के जिला मुख्यालय कवर्धा स्थित कार्यालय, स्थानीय समाचार-पत्रों व इंटरनेट की सहायता से द्वितीयक आंकड़ों का संकलन किया गया है। उत्तरदाताओं के चयन के लिए निदर्षन हेतु संभावित दैव निदर्षन के लॉटरी पद्धति के तहत कुल 300 बैगा उत्तरदाता जिनकी आयु 21 से 60 वर्ष के महिला-पुरूषों का समानुपातिक आधार पर किया गया है। अध्ययन के पष्चात् यह पाया गया कि बैगा जनजातियों की राजनैतिक सहभागिता एवं स्थानीय निकायों में नेतृत्व क्षमता वर्तमान समय में पूर्व की तुलना में वृद्धि दर्ज किया गया है, हालांकि अब भी इस जनजाति समुदाय को आर्थिक एवं राजनैतिक पिछड़ेपन के साथ जीवन-यापन करना पड़ा रहा है। वहीं विभिन्न षासकीय योजनाओं का लाभ नाम मात्र व जमीनी स्तर पर अत्यल्प रूप में देखने को मिल रहा है। कई शासकीय कार्यों का क्रियान्वयन भी गुणवत्ताहीन है। बैगा जनजाति समुदाय की पिछड़ेपन का प्रमुख कारण मद्यपान, अषिक्षा, रोजगार का अभाव, राजनैतिक नेतृत्व क्षमता का अभाव तथा गैर-जनजातीय द्वारा शोषण व हस्तक्षेप है।
KEYWORDS: बैगा जनजाति, शासकीय योजनाएँ, राजनैतिक नेतृत्व, स्थानीय निकायों में बैगा नेतृत्व।
प्रस्तावना:-
भारत एक लोकतांत्रित देश होने के नाते यहाँ के प्रत्येक नागरिक से राजनीति सहभागिता एवं नेतृत्व, विचार अभिव्यक्ति अधिकार, अपनी इच्छानुरूप निवास, भोजन, व्यवसाय तथा विकास कार्यों के साथ-साथ समाज की मुख्यधारा से जुड़कर राष्ट्रीय विकास में सहयोग करने की अपेक्षा किया जाता है। भारत के भौगोलिक संरचना एक समान नहीं होने के कारण यहाँ जीवन शैली, वेष-भूसा, भोजन, आजीविका, कला-साहित्य, सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता, राजनैतिक परिस्थितियों में विभिन्नता दिखाई देता है। इन्हीं के बीच राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र माने जाने वाले भारत के 75 विषेश पिछड़ी जनजातियों में से एक बैगा जो कि मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ की सीमा रेखा मैकल पर्वत श्रेणी में निवास करते हैं। जनगणना 2011 के अनुसार, बैगा जनजातियों की संख्या 5,04,270 है, जिसमें छत्तीसगढ़ में 87,621 निवासरत है। संविधान के अनुच्छेद 330, 332, 335, 338 तथा 73वां संविधान संशोधन 1992-93 में स्थानीय निकायों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण व अनुसूचित वर्ग के लोगों के लिए भी सीटे आरक्षित किया गया है, ताकि वे राजनैतिक नेतृत्व कर अपनी स्थानीय क्षेत्रों में विकास में मुख्य भूमिका निभा सके।
बैगा जनजातियों का छत्तीसगढ़ में निवास/संख्या1
|
क्र. |
जिला |
विकासखण्ड |
ग्रामों की संख्या |
परिवारों की संख्या |
|
1. |
कबीरधाम |
बोड़ला |
190 |
6635 |
|
पंडरिया |
78 |
4625 |
||
|
2. |
मनेन्द्रगढ़-भरतपुर-चिरमिरी |
भरतपुर |
84 |
5174 |
|
खडगवां |
24 |
355 |
||
|
मनेन्द्रगढ़ |
23 |
435 |
||
|
3. |
गौरेला-पेण्डा-मरवाही |
कोटा |
33 |
1520 |
|
गौरेला |
17 |
2095 |
||
|
4. |
मुंगेली |
लोरमी |
46 |
2358 |
|
5. |
खैरागढ़-छुईखदान-गण्डई |
छुईखदान |
39 |
1348 |
|
योग |
531 |
24545 |
||
गैर-जनजातियों की अपेक्षा जनजाति और अन्य जनजातियों की तुलना में बैगा राजनीतिक दृष्टिकोण से 30-35 वर्ष पीछे है। इनके पिछड़ेपन के कई कारण हैं, जैसे-शिक्षा, जागरूकता अभाव, गैर-जनजाति समाज से पृथकता, पारंपरिक जीवन-शैली, कानूनी अधिकार के प्रति अज्ञानता होने से शासन-प्रशासन द्वारा प्रायोजित योजनाओं एवं कार्यक्रमों का उचित लाभ नहीं मिलना, गैर-आदिवासी व स्थानीय नेताओं या अन्य द्वारा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शोषण, इत्यादि सम्मलित है।
राजनीतिक सहभागिता के अनेक तरीके हो सकते हैं, यथा-सामुदायिक गतिविधि जिसके अंतर्गत समुदाय के सदस्य किसी सामूहिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए जैसे कि स्वच्छता, सुरक्षा इत्यादि की व्यवस्था के लिए एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर कार्य करते हैं, इसके अतिरिक्त जब कोई नागरिक किसी व्यक्तिगत/सार्वजनिक मुद्दों को सुलझाने के लिए अपने राजनीतिक प्रतिनिधि से सम्पर्क करते हैं अथवा किसी कारणवश जुलूस, विरोध करना, हड़ताल करना या बहिस्कार इत्यादि गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं।2 शासन तंत्र में लोगों की राजनीतिक सहभागिता या उसकी असहभागिता को स्पष्ट करती है। राजव्यवस्थाओं की प्रकृति, उनकी कार्यप्रणाली, कार्यक्षमता और प्रभावकारिता को समझने में सहभागिता का निर्णायक महत्व होता है।3
बदलते समय के साथ-साथ आदिवासियों की गैर-आदिवासी समुदाय से संपर्क होने से वे भी अपने अस्तित्व को पहचाना तथा धीरे-धीरे संवैधानिक अधिकारी, राजनीतिक सहभागिता, दल बनाना, विकास मार्ग को चुनना तथा राजनीतिक जागरूकता में निरंतर वृद्धि, इत्यादि। कई कारणों से पिछले एक-दो दशकों में आदिवासियों में राजनैतिक जागरूकता के परिणामस्वरूप बैगा जनजाति पर इसका सकारात्मक प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा है।
शोध साहित्य का पुनरावलोकन: सिंह, कुंवर प्रताप एवं संध्या शुक्ला (2023)4 ने राजनीति में अनुसूचित जनजातियों की सहभागिता अपने अध्ययन के निष्कर्ष बताया अनुसूचित जनजातियों ने सामाजिक, आर्थिक, वैवाहिक परिस्थितियों का निर्वाह करते हुए राजनीति में रूचि ले रहे है, अनुसूचित जनजातियों में शिक्षा के विकास का स्तर ज्यादा अच्छा नही है राजनीति को कम समझ पा रहे है, राजनैतिक स्तर पर अनुसूचित जनजातियाँ का व्यवहार गांव के वातावरण पर निर्भर है उनका कोई ज्यादा विचार नही होता है।
राजपूत, उदय सिंह (2020)5 ने बैगा जनजाति की परम्परागत राजनीतिक व्यवस्था एवं पेसा अधिनियम: पूर्वी मध्यप्रदेश से कुछ अनुभवजन्य साक्ष्य अपने अध्ययन के निष्कर्ष में पाया कि बैगा बहुल क्षेत्रों में ही सरपंच बैगा समुदाय से न होकर गोण्ड या अन्य जनजाति से है। कुछ जगह पर यह देखने में आया कि गाँवों में सम्पन्न राठौर या यादव जो गैर जनजाति वर्ग से है, उप-सरपंच के पद पर चयनित हुये है और सरपंचों के सारे अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं। यह दोनों ही स्थितियाँ बैगा में राजनीतिक जागरूकता के कम होने, क्षमता का अभाव तथा राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी के प्रति अनिच्छा को प्रदर्शित करती है।
चौरसिया, गायत्री (2019)6 अनुसूचित जनजाति के नेतृत्व की प्रवृत्ति ने अपने शोध में मध्यप्रदेश के रीवा जिले के अंतर्गत् ग्राम पंचायत बांसा के विषेष सन्दर्भ में अनुसूचित जनजातियों में नेतृत्व की प्रवृत्ति का अध्ययन किया और अपने निष्कर्ष में पाया कि अनुसूचित जनजाति नेतृत्व पंचायतों में अल्प प्रतिस्पर्धा से आया है। उनकी ग्रामीण विकास एवं सामाजिक सुधार की बात उत्साहवर्धक मानी जा रही है। संचार माध्यमों के प्रति उनकी जागरूकता, अषिक्षा एवं कमजोर सामाजिक आर्थिक स्थिति से जुड़े विषय शामिल है।
तिग्गा, आनंद प्रकाश (2016)7 ने छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में बैगा जनजाति के विकास में पंचायती राज व्यवस्था की भूमिका: एक राजनैतिक विश्लेषण अपने अध्ययन के निष्कर्ष में बताया कि पंचायती राज द्वारा बैगा जनजातियों को उसी प्रकार की सुविधाएँ प्रदान की जाती है, जैसे कि मैदानी क्षेत्रों में अन्य समुदाय अथवा ग्राम पंचायतों को दिया जाता है तथा विषेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी केन्द्र एवं राज्य शासन द्वारा षिविर आयोजन के माध्यम से दिया जाता है, ताकि बैगा जनजाति भी विकास की राह में कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ सके।
प्रियंका, मार्को (2016)8 ने छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति समुदाय के विकास में आरक्षण का प्रभाव: एक अध्ययन अपने निष्कर्ष में छत्तीसगढ़ शासन की आरक्षण व्यवस्था को इंगित किया गया है। स्थानीय निकायों में महिला जनप्रतिनिधि नगण्य है, इस समुदाय में महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति अत्यंत खराब एवं निम्न स्तर का बताया गया है।
मस्करे, शीलावंती (2015)9 ने अनुसूचित जनजाति महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक विकास पर पंचायत राज का प्रभाव, में बताया कि अनुसूचित जनजाति की महिलाओं की आर्थिक एवं सामाजिक विकास पर पंचायत का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। पंचायती राज संस्थानों में महिला आरक्षण (अनुसूचित जनजाति/जाति) के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में नेतृत्व करने के अवसर मिलने से मानसिक, सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से सक्षम मान रहे हैं।
अध्ययन का उद्देश्य:
1. बैगा समुदाय की सामाजिक व शैक्षणिक स्थिति को ज्ञात करना।
2. बैगा जनजाति द्वारा राजनैतिक सहभागिता का अध्ययन करना।
3. बैगा जनजाति की स्थानीय निकायों में राजनैतिक नेतृतव की स्थिति को ज्ञात करना।
शोध अध्ययन का महत्व: विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में जहाँ प्रत्येक नागरिक को अपने राजनैतिक अधिकार, कर्तव्य पालन इत्यादि उपबंध किया गया है। हमारे समाज में लोकतांत्रित स्थिति एक जैसे है किन्तु क्रियान्वयन एक जैसी नहीं है। इसके पीछे उस क्षेत्र समुदाय, जाति, वर्ग की शैक्षणिक, राजनैतिक स्थिति का निम्न स्तर होना है। ऐसे में उक्त स्थिति के कारण इनके विकास मार्ग में बाधा पहंुचती है, साथ ही राज्य व राष्ट्रीय विकास में भी बाधा होती है जिसके लिए सरकार को समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए विषेष प्रयास करना पड़ात है, जिसके लिए सरकार को अतिरिक्त व्यय या बजट करना पड़ता है। प्रत्येक समाज में राजनैतिक नेतृत्व व सहभागिता सुदृढ़ होना आवष्यक है।
शोध-प्रविधि: प्रस्तुत शोध वर्णात्मक एवं विवरणात्मक शोध प्ररचना के अंतर्गत है। प्राथमिक आंकड़ों के लिए साक्षात्कार अनुसूची व अवलोकन विधि का प्रयोग किया गया है, साथ ही द्वितीयक आंकड़ों के लिए जिला निर्वाचन कार्यालय, कबीरधाम, स्थानीय समाचार पत्र एवं शोध पत्र-पत्रिकाएँ, इंटरनेट इत्यादि का प्रयोग किया गया है।
निदर्शन के अंतर्गत उत्तरदाताओं के चयन हेतु दैव निदर्शन के लॉटरी पद्धति का प्रयोग करते हुए कुल 300 बैगा जनजाति महिला-पुरूषों का चुनाव बैगा बहुल ग्रामों से किया गया है जिसमें उत्तरदाताओं की आयु 18 वर्ष से अधिक है।
सारणी-01: अध्ययन क्षेत्र के उत्तरदाताओं का चयन
|
क्र. |
विकासखण्ड |
|||
|
बोड़ला |
पण्डरिया |
|||
|
चयनित ग्राम |
उत्तरदाताओं की संख्या |
चयनित ग्राम |
उत्तरदाताओं की संख्या |
|
|
1 |
सिवनीकला |
07 |
दमगढ़ |
09 |
|
2 |
कुकरापानी |
12 |
देवानपटपर |
10 |
|
3 |
जामपानी |
13 |
गुढ़ा |
06 |
|
4 |
पीपरखुटा |
09 |
पोलमी |
12 |
|
5 |
कटगो |
07 |
सारपानी |
10 |
|
6 |
सरोधादादर |
18 |
आगरपानी |
11 |
|
7 |
लावा |
08 |
अमनिया |
10 |
|
8 |
बेंदा |
11 |
बकेला |
09 |
|
9 |
कोमो |
10 |
कुषियारी |
06 |
|
10 |
गर्रा |
07 |
नागाडबरा |
10 |
|
11 |
शीतलपानी |
09 |
पोलमी-2 |
13 |
|
12 |
सिलयारी |
15 |
ऊपरपारा |
12 |
|
13 |
भूरमीपकरी |
24 |
कुकदूर |
10 |
|
14 |
सोनतरा |
12 |
चतरी |
12 |
|
15 |
चिल्फी |
14 |
नेउर |
10 |
|
योग |
150 |
|
150 |
|
|
महायोग & 150 $ 150 = 300 |
||||
अध्ययन क्षेत्र का परिचय: प्रस्तुत अध्ययन क्षेत्र छत्तीसगढ़ राज्य के कबीरधाम जिले के अंतर्गत बैगा बहुल विकासखण्ड बोड़ला व पण्डरिया को लिया गया है। राष्ट्रीय राजमार्ग-30 जिले के मध्यभाग से गुजरता है। यहाँ दो शक्कर कारखाना (भोरमदेव व सरदार वल्लभ भाई पटेल शक्कर कारखाना) स्थित है। जिला सांख्यिकी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023-24 के अनुसार कबीरधाम जिले में 08 तहसील एवं 996 ग्राम है। वहीं आबाद ग्राम की संख्या 950 तथा 465 ग्राम पंचायत है। यहाँ 04 जनपद पंचायत, 02 नगर पालिका परिषद व 05 नगर पंचायत है।
सारणी-02: जिला कबीरधाम का तहसीलवार भौगोलिक एवं प्रशासनिक संरचना
|
क्र. |
तहसील का नाम |
भौगोलिक क्षेत्रफल (वर्ग कि.मी. में) |
कुल ग्राम |
(संख्या) आबाद ग्राम |
(संख्या) ग्राम पंचायत |
|
1- |
कवर्धा |
244-08 |
83 |
83 |
50 |
|
2- |
बोड़ला |
1324-66 |
244 |
223 |
95 |
|
3- |
सहसपुर लोहारा |
975-20 |
197 |
187 |
96 |
|
4- |
पण्डरिया |
280-94 |
98 |
94 |
52 |
|
5- |
कुंडा |
240-35 |
88 |
86 |
54 |
|
6- |
पिपरिया |
287-35 |
98 |
97 |
54 |
|
7- |
रेंगाखारकला |
397-98 |
97 |
91 |
28 |
|
8- |
कुकदूर |
696-49 |
91 |
89 |
36 |
|
जिला-कबीरधाम |
4447-05 |
996 |
950 |
465 |
|
अध्ययन क्षेत्र से प्राप्त तथ्यों का विष्लेषण:
सारणी-03: उत्तरदाताओं के राजनीति समाचार प्राप्त करने हेतु संचार माध्यम
|
क्र. |
विवरण |
अभिमत |
महायोग |
||
|
हाँ |
नहीं |
कभी-कभी |
|||
|
1- |
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया |
03 Ό1-0½ |
09 Ό3-0½ |
12 Ό4-0½ |
24 Ό8-0½ |
|
2- |
प्रिंट मीडिया |
05 Ό1-66½ |
07 Ό2-33½ |
14 Ό5-66½ |
29 Ό9-66½ |
|
3- |
परिवार, पड़ोसी व मित्रगण |
173 Ό57-66½ |
09 Ό3-0½ |
65 Ό21-66½ |
247 Ό82-33½ |
|
योग |
181 Ό60-33½ |
25 Ό8-33½ |
94 Ό31-33½ |
300 Ό100½ |
|
नोट: कोष्ठक में प्रदर्षित आंकड़े उत्तरदाताओं कुल संख्या के प्रतिशत को प्रदर्षित करता है।
सारणी से स्पष्ट होता है कि अध्ययन क्षेत्र के चयनित उत्तरदाताओं में से सर्वाधिक 82.33 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि परिवार, आस-पड़ोस व मित्रगण ही राजनीतिक समाचार प्राप्त करने के मुख्य स्रोत हैं, वहीं 9.66 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने राजनीतिक समाचार प्राप्त करने के स्रोत के रूप में प्रिंट मीडिया को सहायक बताया जबकि 8.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को राजनीतिक समाचार प्राप्त करने का मुख्य स्रोत बताए हैं।
उत्तरदाता, जिन्हें राजनीतिक समाचार नियमित रूप से प्राप्त होने की जानकारी दिए हैं, उनका प्रतिशत 181 है, जिसमें से 57.66 प्रतिशत उत्तरदाताओं को परिवार, आस-पड़ोस, मित्रगण या अपने रिश्तेदारों से राजनीतिक समाचार संबंधी जानकारी प्राप्त होती है, प्रिंट मीडिया से नियमित जानकारी प्राप्त करने वाले उत्तरदाताओं का प्रतिशत 1.66 है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से केवल 1.0 प्रतिशत उत्तरदाताओं को राजनीति संबंधी नियमित जानकारी प्राप्त होती है। 8.33 प्रतिशत उत्तरदाताओं को उक्त किसी भी माध्यम से राजनीति समाचार संबंधी जानकारी प्राप्त नहीं होती है। 31.33 प्रतिशत उत्तरदाताओं को राजनीति समाचार संबंधी जानकारी कभी-कभी ही प्राप्त होती है, जिसमें से सर्वाधिक 21.66 प्रतिशत उत्तरदाता पड़ोसी, पारिवारिक सदस्यों व रिश्तेदारों व मित्रगणों से जानकारी मिलती है। प्रिंट मीडिया के माध्यम से कभी-कभी राजनीति समाचार संबंधी जानकारी प्राप्त होने की जानकारी 5.66 उत्तरदाताओं ने दिए हैं, जबकि 4.0 उत्तरदाताओं को कभी-कभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से प्राप्त होती है। उपरोक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि आज भी 21वीं शताब्दी में तकनीकी युग में बैगाओं में सामाजिक-राजनीतिकरण में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अथवा प्रिंट मीडिया का प्रभाव नगण्य है। जबकि राजनीति संबंधी जानकारियाँ इन्हें परम्परागत रूप में अपने परिवारिक सदस्य, आस-पड़ोस या पड़ोसी व मित्रगणों के माध्यम से ही प्राप्त हो रहा है जिसके परिणामस्वरूप बैगा आदिवासियों की राजनीतिक प्रभाव राज्य व पंचायती निकायों में नाम मात्र है।
उत्तरदाताओं का जातीय पंचायत/ग्राम पंचायत में सक्रिय होना
सारणी-04: उत्तरदाताओं का जातीय पंचायत/ग्राम पंचायत में सक्रिय होना
|
क्र. |
अभिमत |
संख्या |
प्रतिशत |
|
1- |
हाँ |
97 |
32-33 |
|
2- |
नहीं |
120 |
40-0 |
|
3- |
तटस्थ |
31 |
10-33 |
|
4- |
आंशिक |
52 |
17-33 |
|
योग |
300 |
100 |
|
तालिका से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के चयनित उत्तरदाता से उत्तरदाताओं का जातीय पंचायत/ग्राम पंचायत में सक्रिय होने के संदर्भ में तथ्यों को संकलित किया गया, जिसमें सर्वाधिक 43.66 प्रतिशत उत्तरदाता जातीय पंचायत/ग्राम पंचायत में सक्रिय होना स्वीकार किये हैं, जिसमें से 32.33 प्रतिशत उत्तरदाता पूर्णतः सक्रिय व 17.33 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने जातीय पंचायत/ग्राम पंचायत में आंशिक रूप से सक्रिय होने की बात स्वीकार किये हैं, जबकि 40.0 प्रतिशत उत्तरदाता किसी भी पंचायत में सक्रिय नहीं होने के संदर्भ में जानकारी दिए हैं, जिनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। वहीं 10.33 प्रतिशत उत्तरदाता उक्त विचार से तटस्थ है। उपरोक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि अब बैगा आदिवासी अपने जातिगत पंचायत में सामान्यतः महिलाओं को शामिल नहीं करते हैं। जातीय पंचायत के प्रमुख को मुकद्दम कहा जाता है है जो सभी के सुझावों व समर्थन के बाद अंतिम निर्णय लेता है। निर्णय लने में लोग उसके साथ देते हैं, जातीय पंचायत में चुनाव जैसी प्रणाली नहीं होती है, मुखिया का चयन परंपरागत तरीके से होता है, लेकिन बदलते के प्रभाव में वे भी आ रहे हैं।
उत्तरदाता द्वारा सार्वजनिक कार्यों हेतु जनसामान्य से सम्पर्क करना: एक जनप्रतिनिधि होने के नाते व्यक्ति को मतदाताओं या अपने क्षेत्रों/गांवों में सार्वजनिक कार्यों अथवा विभिन्न कारणों से जनसामान्य से संपर्क करना होता है ताकि वह अपने कार्यों के समर्थन में आम लोगों का मत प्राप्त कर यह सुनिष्चित कर सके कि वह कार्य विषेश सर्वाधिक लोगों के लिए हितैशी है। जनता से प्रत्यक्ष संपर्क कर मत एकत्र करने से जनप्रतिनिधियों के आत्मविष्वास में वृद्धि होती है और वे इससे प्रेरणा लेकर जनहित में समर्पित होकर कार्य करते है। उक्त तथ्यों के संदर्भ में उत्तरदाओं से तथ्यों का संकलन किया गया है।
सारणी-04: उत्तरदाताओं द्वारा सार्वजनिक कार्यों हेतु जनसामान्य से सम्पर्क करना
|
क्र. |
अभिमत |
संख्या |
प्रतिशत |
|
1- |
घर-घर जाकर |
38 |
12-7 |
|
2- |
सभा बुलाकर |
61 |
20-3 |
|
3- |
गांव में चौपाल लगाकर |
145 |
48-3 |
|
4- |
उक्त सभी |
56 |
18-7 |
|
योग |
300 |
100 |
|
तालिका से स्पष्ट है कि अध्ययन क्षेत्र के चयनित उत्तरदाताओं में से सर्वाधिक 48.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि गांव में चौपाल लगाकर सार्वजनिक कार्यों हेतु जनसामान्य से सम्पर्क करते हैं, 20.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं बताया कि ग्राम पंचायत में सभा बुलाकर सार्वजनिक कार्यों हेतु जनसामान्य से सम्पर्क करते हैं, वहीं 12.7 प्रतिशत उत्तरदाताओ ने बताया कि घर-घर जाकर सार्वजनिक कार्यों हेतु जनसामान्य से सम्पर्क करते हैं, जबकि 18.7 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने बताया कि उक्त तीनों ही तरीकों से आवश्यकतानुसार जनसम्पर्क कर सार्वाजनिक कार्यों हेतु जनसामान्य की इच्छा या मत जानने का प्रयास करते हैं। उपरोक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि अध्ययन क्षेत्र में बैगा जनप्रतिनिधियों द्वारा आवश्यकतानुसार जनसामान्य से सार्वजनिक कार्यों के संबंध में जनसम्पर्क करते हैं। ग्राम पंचायत में ग्राम सभा के दौरान अधिकांश कार्यों की सहमति के बाद जनप्रतिनिधि अपने ग्राम में चौपाल के माध्यम से जनसामान्य से सम्पर्क कर अपना प्रस्ताव रखकर सार्वजनिक कार्यों की जानकारी देते हैं और उन कार्यों के प्रति जनसामान्य का विचार व सहमति की जानकारी लेते हैं।
समस्याएँ:
प्रस्तुत अध्ययन क्षेत्र में जनजातियों को अभी भी आर्थिक-राजनैतिक दृष्टिकोण से पिछड़े हुए हैं। शासकीय व गैर-शासकीय संस्थाओं द्वार अनेक प्रकार से शैक्षणिक, स्वास्थ्य एवं अन्य विकास कार्यों के लिए योजना बनायी व संचालित की जा रही है, किन्तु जमीनी स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन सिर्फ खानापूर्ति के समान है। आर्थिक स्थिति अभी निम्न बनी हुई है तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे महत्वकांक्षी योजना का लाभ बैगाओं को सरलता से प्राप्त नहीं हो रहा है। स्थानीय निकायों में सरपंच/पंच की भूमिका का सही ढंग से नहीं निभा पा रहे हैं। इसके पीछे अशिक्षा, मद्यपान, विकास कार्यों के प्रति गंभीर न होना तथा गैर-बैगा जनजातियों का प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप होना है।
सुझाव :
बैगा आदिवासी समुदाय के विकास हेतु अनेक योजनाएँ हैं किन्तु शासन/प्रशासन को मिलकर निष्ठापूर्वक जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन किया जाना चाहिए, इन्हें शिक्षा के प्रति जागरूक कर राजनैतिक महत्व को बताया जाना चाहिए। गैर-जनजातीय हस्तक्षेपों को कानूनी प्रावधान से कठोरतापूर्वक लागू किया जाना चाहिए तथा बैगा जनजातियों के बाल एवं युवा वर्ग के शिक्षा, स्वास्थ्य व राजनैतिक शिक्षा व जागरूकता हेतु आवश्यक कदम उठाने चाहिए, बैगा अधिकारों की महत्ता एवं उपयोगिता को बताते हुए आवष्यकतानुसार शिविर/चौपाल इत्यादि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष:
प्रस्तुत शोध बैगा जनजातियों की राजनैतिक सहभागिता एवं स्थानीय निकायों में नेतृत्व क्षमता पर आधारित है। वर्तमान समय में इस जनजाति समुदाय को आर्थिक एवं राजनैतिक पिछड़ेपन के साथ जीवन-यापन करना पड़ रहा है। वहीं विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ नाम मात्र व जमीनी स्तर पर अल्प संख्या में देखने को मिल रहा है। कई शासकीय कार्यों का क्रियान्वयन भी गुणवत्ता ही न है। बैगा जनजाति समुदाय की पिछड़ेपन का प्रमुख कारण शराब की लत, अशिक्षा, रोजगार के अवसरों की कमी, राजनैतिक नेतृत्व क्षमता का अभाव व अवसर की कमी, गैर-जनजातीय लोगों द्वारा शोषण व हस्तक्षेप इत्यादि है।
संदर्भ सूची:
1. छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन पर राज्यपाल का प्रतिवेदन, छ.ग. षासन आदिमजाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग, नया रायपुर, 2016-17, पृ. 220
2. वर्बा, एस. सिडनी एण्ड नार्मन एच. पार्टीसिपेशन इन अमेरिका: पॉलिटिकल डेमोक्रेसी एण्ड सोशियल इक्वालिटी, न्युयार्क हायर एण्ड रॉ पब्लिशर्स, 1972, पृ. 223.
3. राठौर, मीना भारत में राजनीतिक दल, 2003, पृ. 229.
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6. चौरसिया, गायत्री अनुसूचित जनजाति के नेतृत्व की प्रवृत्ति (रीवा जिले के ग्राम पंचायत बांसा के विषेश संदर्भ में) इंटरनेशनल जर्नल ऑफ रिव्यूव एण्ड रिसर्च इन सोषल साइंस, अंक-07, भाग-02, अप्रैल- जून, 2019, पृ. 502-510.
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9. मस्करे, शीलावंती, अनुसूति जनजाति महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक विकास पर पंचायत राज का प्रभाव, अप्रकाषित शोध प्रबंध, डॉक्टर बी. आर. अम्बेडकर नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ सोशल साइंस महू, मध्यप्रदेश, 2015.
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Received on 17.06.2025 Revised on 09.07.2025 Accepted on 05.08.2025 Published on 22.08.2025 Available online from September 05, 2025 Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(3):149-156. DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00023 ©A and V Publications All right reserved
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